श्रीप्रभु के अग्रज श्री हनुमंत दादासाहेब महाराज की १५९वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आज संगम में स्थित उनके समाधि मंदिर में विशेष पूजा संपन्न हई।

प्रभु चरित्र में दादासाहेब महाराज के जन्म एवं बाल्यकाल का जो वर्णन है वह अत्यंत विस्मयकारक है। बचपन में उनका जो वर्तन था उसे देखकर लोगों को उसी समय उनके असाधारण व्यक्तित्व का परिचय हो गया था। एकांतप्रिय दादा साहेब का जीवन पहले से ही वैराग्यमय रहा। जन्म से लेकर उपनयन तक वे मौन रहे इसलिए सब उन्हें गूंगा समझते थे परंतु उपनयन के समय जैसे ही उनके कानों में गायत्री मंत्र का उपदेश हुआ वे बोलने लगे। ऐसी विचित्र घटनाओं ने एवं दादा साहेब के स्वभाव ने लोगों को तो आश्चर्यचकित किया था परंतु उनके पिता अपने पुत्र के सामर्थ्य से भली-भांति परिचित थे। पहले तो लोग कहते थे, कि मनोहर नाईक का कैसा दुर्भाग्य है जो इनको ऐसा, न बोलने वाला और न हंसने वाला बच्चा जन्मा है। परंतु श्रीप्रभु के जन्म के बाद सबको यह बात समझ आ गई थी, कि यह सब प्रभु के अवतार से जुड़ी हुई पूर्वनिर्धारित योजनाओं के अनुसार हो रहा है।

बाहर से देखने वालों को मनोहर नाईक के तीन पुत्र भले ही अलग-अलग दिखते हों परंतु वास्तव में प्रभु के दोनों बंधु उन्हींके विराट अवतार के अभिन्न भाग थे। भगवान्‌ जब अवतार लेते हैं, तब अकेले नहीं आते। अपने संग सहकारियों को लेकर आते हैं और इन सहकारियों की सहायता से प्रभु अपने अवतार कार्य को पूर्ण करके निजधाम लौट जाते हैं। जैसे भगवान्‌ राम का कार्य और उनका जीवन हनुमानजी एवं लक्ष्मणजी के अवतार के बिना असंभव था, जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण का कार्य अर्जुन तथा बलरामजी के सहकार्य के बिना अधूरा ही होता उसी तरह श्रीप्रभु का अवतार और उनका कार्य उनके दोनों बंधुओं के सहकार्य से ही सफल हुआ। इसलिए श्रीप्रभु के अवतार को अलग से न देखते हुए हमें यह समझना होगा कि श्रीप्रभु अपने दोनों बंधुओं साथ में लेकर प्रगट हुए। इसी बात को श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज श्रीप्रभु की आरती में कहते हैं: नरहरी मोहनिशि हरी दुष्टगज हरी अनुज हो त्याचा। ज्या वर्णनी थकली शेष बृहस्पति वाचा। हनुमंत सहित गुरु त्रिगुण मूर्ति प्रगटवी। जय प्रताप श्री यश भक्तां वाढवी।। महाराजश्री कहते हैं, अपने दोनों बंधुओं समेत श्रीप्रभु का जो अवतार हुआ है वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार के समान संयुक्त अवतार है। ऐसा कहने का एक और कारण यह है, कि श्रीप्रभु ने अपनी समाधि से पहले अपने दोनों बंधुओं को निजधाम भेजा और फिर स्वयं समाधिस्त हुए। ठीक वैसे ही, जैसे कोई वाहन चालक सभी यात्रियों को गाडी में बिठाने के बाद ही खुद आखिर में गाडी पर सवार होता है।

जिन लोगों ने प्रभु चरित्र पढ़ा है, वे जानते हैं, कि श्रीप्रभु के कार्य को सफल बनाने में दादा महाराज तथा तात्या महाराज की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। सन्‌ १८४५ में श्रीप्रभु ने माणिकनगर की स्थापना की और उस समय प्रभुमहाराज ने नगर व्यवस्था तथा सभी योजनाओं को मूर्तरूप देने का कार्यभार दादा महाराज के ही कंधों पर सौंपा था। उन दिनों तात्या महाराज कल्याण के नवाब की कचहरी में कार्यरत थे इसलिए संस्थान की व्यवस्था से लेकर सभी अन्य छोटे-बड़े प्रबंध करने का उत्तरदायित्व दादा महाराज ने सम्हाला था। यद्यपि यह सारे कार्य उनके स्वभाव और रुचि से विपरीत थे तथापि उन्होंने प्रभु द्वारा उनपर सौंपा हुआ उत्तरदायित्व अत्यंत दक्षता से पूर्ण किया। माणिकनगर पधारने वाले प्रत्येक सद्भक्त की व्यवस्था यथोचितरीति से होती थी परंतु उनमें जो वृद्ध जन और छोटे बच्चे होते थे उनपर दादा महाराज का विशेष ध्यान रहता था। प्रभु के दरबार में पधारे भक्तजनों को उनके वास्तव्य के दौरान यहॉं किसी भी प्रकार की कोई असुविधा न हो इसका वे विशेष ध्यान रखते थे। प्रभु दर्शनार्थ माणिकनगर आए भक्तजनों के छोटे बच्चों को दिन में दो बार दूध मिले ऐसी व्यवस्था उन्होंने की थी और वे स्वयं बड़ी बारीकी से इस बात का ध्यान रखते थे। आज माणिकनगर में विद्यमान श्री शिवपंचायतन्‌ देवालय तथा ग्रामस्थ हनुमान मंदिर का निर्माण दादा महाराज के ही कुशल नेतृत्व में पूर्ण हुआ है। कालांतर में श्रीप्रभु के अनुज श्री नृसिंह तात्या महाराज ने श्रीसंस्थान का कार्यभार सम्हाला और दादा महाराज अपने जप-तप अनुष्ठान में अधिक समय बिताने लगे।

दादा महाराज को हठयोग विद्या में प्राविण्य प्राप्त था और वे श्रीविद्या के पहँचे हुए उपासक थे ऐसा चरित्र में पढकर हमें ज्ञात है। परंतु वास्तव में उनकी योग्यता और उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य का आकलन करने का प्रयास यदि हम करें तो उसे नादानी ही कहना होगा। दादा महाराज जैसे श्रेष्ठ योगी को श्रीप्रभु जैसे महान्‌ संत अनुज के रूप में प्राप्त थे। इससे बढिया संयोग और क्या हो सकता है? जिस समय दादा महाराज को यह संकेत मिला, कि जिस महान कार्य के लिए उनका जन्म हुआ था अब वह परिपूर्ण हो रहा है और उनके दिव्य जीवन का उद्देश्य भी पूर्ण हो चुका है, तब वे श्रीप्रभु के पास गए। कहते हैं, कि तीन दिनों तक दादा महाराज और श्रीप्रभु एकांत में रहे। अब इस बीच उनमें क्या चर्चा हुई, क्या बातचीत हुई और क्या घटित हुआ यह विषय हम जैसे कच्चे बुद्धि वाले सामान्य जीवों की समझ के बाहर का विषय है। श्रीप्रभु की अनुज्ञा से दादा महाराज ने यह निश्चित किया था, कि नियोजित तिथि को वे अपनी जीवन यात्रा को विराम देंगे। इस अनपेक्षित समाचार से माणिकनगर के वातावरण में एक गंभीरता छा गई और सबके मन दुःख से भर गए।

फाल्गुन शुद्ध प्रतिपदा के दिन दादा महाराज ने शास्त्र के आदेशानुसार अपने माता की आज्ञा लेकर श्रीप्रभु चरणों की अनुज्ञा ली और समाधि विधि को आरंभ किया। स्वयं प्रभु महाराज अपनी देखरेख में विद्वान पंडितों द्वारा धार्मिक विधि संपन्न करवा रहे थे। माणिकनगर में हज़ारों की संख्या में एकत्रित हुए स्त्री-पुरुष भारी मन से इस अलौकिक घटना के दर्शन कर रहे थे। कुछ क्षणों के लिए ही सही परंतु वहॉं उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण को महाराजश्री ने वैराग्य के रंग से सराबोर कर दिया था। इस दृष्य को देख रहे प्रत्येक व्यक्ति की आंखें आंसुओं से डबडबाई हुईं थीं परंतु चिदानंद में निमग्न दादा महाराज का चेहरा ब्रह्मतेज के लावण्य से निखर रहा था। शास्त्रानुसार दादा महाराज ने सन्यास आश्रम स्वीकार किया और महाप्रयाण के लिए आसन पर सिद्ध हुए। साधू, बैरागी और फकीरों की बड़ी भीड़ यह अनुपम दृष्य देखने के लिए माणिकनगर में उपस्थित थी। दादा महाराज ने अंतिम बार श्रीप्रभु की अनुज्ञा ली और आसन जमाकर बैठे। भजन और मृदंग के तुमुल निनाद के बीच दादा महाराज ने आंखें मूंदीं और योगमार्ग के अवलंब से ब्रह्मरंध्र का भेदन कर प्राणज्योति को प्रभुचरणों में लीन किया। प्राणोत्क्रमण के पश्चात्‌ महाराजश्री के पार्थिव देह को फूलों से सजाई हुई पालखी में रखकर भक्तजन, भजन और जयघोष के बीच संगमस्थित उनके समाधिस्थल पर पहुँचे। श्रीप्रभु के समर्थ नेतृत्व में दादा महाराज की समाधि का विधान विधिवत्‌ पूर्ण हुई और कालांतर में श्रीप्रभु ने ही समाधि स्थान पर एक सुंदर देवालय का निर्माण करवाया।

फाल्गुन शुद्ध प्रतिपदा (शनिवार १ मार्च १८६२) का दिन श्री हनुमंत दादा साहेब महाराज के पुण्यस्मरण का पर्व है। प्रतिवर्ष इस दिन, संगम में स्थित उनकी समाधि की महापूजा एवं आराधना संपन्न की जाती है। श्री दादा साहेब महाराज का जीवन एवं उनका कार्य हमें सदा श्रीप्रभु चरणों की सेवा में समर्पित रहने की प्रेरणा प्रदान करता है। उस दिन भले ही महाराजश्री का देह पंचतत्त्वों में लीन हो गया हो परंतु उनकी कीर्ति सुगंध के रूप में आज भी इस नगर के वातावरण में प्रवाहित हो रही है। उस सुगंध से हमारा जीवन प्रभुमय हो ऐसी कामना करते हुए महाराजश्री की पुण्यतिथि के अवसर पर हम कृतज्ञतापूर्वक उनके चरणों में नमन अर्पित करते हैं।