ज्ञान प्रबोध

परम पूज्य श्रीजी, अधिक मास के निमित्त गत तीस दिनों से  हम सभी को आपके कारण, गीता ज्ञानयज्ञ का लाभ लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हम प्रभुभक्तों के लिए यह जीवन का एक अविस्मरणीय प्रसंग होगा। आपके द्वारा किया गया प्रबोधन अद्वितीय था और मैं निःसंदेहरूप से यह कह सकता हूँ  कि, इस प्रबोधन से कईं लोगों का जीवन के तरफ देखने का नज़रिया बदल गया होगा।

आपका प्रबोधन बीजरूपी गीता का ज्ञानरूपी वृक्ष था। जिसने भी इस वृक्ष का फल चखा, वह धन्य हो गया ऐसा मेरा मानना है। श्रीमद्भगवद्गीता का विषय इतना गहन है, कि सहसा जब हम पढ़कर समझने का प्रयास करते हैं तो विषय का संपूर्ण बोध नहीं हो पाता। परंतु गीता के कठिनतम रहस्यों को भी आपने अपनी शैली में जिस कुशलता से प्रस्तुत किया, हम सचमुच मंत्रमुग्ध रह गए।

गीता का प्रत्येक वचन, विस्तार से समझाने हेतु आपके द्वारा दिए गए उदाहरण, दृष्टांत तथा अन्य प्रासंगिक सन्दर्भ, इतने बोधपूर्ण तथा मधुर थे कि, हम सब तृप्त हो गाए। बिलकुल वैसे ही जैसे शिशु, दूध का आकंठ पान करने के बाद तृप्त होता है।

मैं समझता हूं कि, इन तीस दिनों के प्रबोधन से श्रोतृ वर्ग में हर किसी का दुःख थोड़ा तो कम हुआ ही होगा और सबके भीतर कोई न कोई परिवर्तन अवश्य हुआ होगा। चाहे वह  कॉलेज का युवा होगा, चाहे कोई करियर की चिंता में नौकरी ढूंढने वाला हो, चाहे कोई विवाह के चक्कर में हो, चाहे कोई व्याधि से पीड़ित हो, या कोई वृद्ध हो, हर व्यक्ति को उसकी समस्या का हल ज़रूर मिला है।

आपने  जिस तन्मयता और करुणा के साथ हम सभी का प्रबोधन किया, उसके बदले यदि शिष्य होने के नाते आपके उपदेशों का एक प्रतिशत भाग भी हम आत्मसात करेंगे और थोड़ा सा भी यदि अनुसरण करेंगे तो निश्चित ही हमारा उद्धार होगा इसमें संशय नहीं है।

गत अनेक वर्षों से आपके आध्यात्मिक मार्गदर्शन के फलस्वरूप आज हमारे संप्रदाय में एक बहुत अच्छा परिवर्तन हुआ है। अनेक सद्भक्तों की वेदांत में रुचि बढ़ रही है और प्रभु के उपदेशों के अर्थ को जानने – समझने की लालसा बढ़ती जा रही है। यह एक बहुत ही कौतुकास्पद बदलाव है जिसका श्रेय केवल आपको जाता है। हमारे सांप्रदायिक वांग्मय में इतने अनमोल हीरे-मोती अनेक वर्षों से छिपे हुए हैं परंतु आज आपके मार्गदर्शन के कारण ही उन अनमोल उपदेशों को हम समझ पा रहे हैं, आत्मसात्‌ कर पा रहे हैं। आप तो सद्गुरु होने के नाते केवल अपना कार्य कर रहे हैं परंतु शिष्य होने के नाते हमारा भी यह कर्तव्य बनता है, कि हम आपके बताए हुए मार्ग पर सफलतापूर्वक चल कर दिखाऍं। हम भक्तजनों के जीवन को परिवर्तित करके हमारे भीतर अद्वैत वासना पैदा करने के लिए मैं समस्त भक्त परिवार की ओर से आपको नमनपूर्वक धन्यवाद कहता हूँ।

आपके मुखकमल से निरंतर ज्ञान की सरित इसी तरह बहती रहे और श्रीप्रभु के दिव्य संदेश के प्रचार-प्रसार का जो महान्‌ कार्य आप विश्वभर में कर रहे हैं उससे लाखों – करोड़ों लोगों का उद्धार होता रहे। ऐसी मंगल कामना प्रभु चरणों में करते हुए विराम लेता हूँ।

श्रीमधुमती पंचरात्रोत्सव

योगिनी व्यंकम्मा ने आजीवन श्रीप्रभुचरणों की सेवा की तथा प्रभुमहाराज के प्रति असीम श्रद्धा-भक्ति के फलस्वरूप परमपद को प्राप्त हुईं। व्यंकम्मा, वैश्य कुल की एक साधारण विधवा स्त्री थी परंतु श्रीगरुचरणों के प्रति उनकी जो अचंचल भक्ति थी उस भक्ति ने उनको असाधारण शक्ति एवं सामर्थ्य से युक्त देवीपद पर असीन किया। श्रावण कृष्ण त्रयोदशी शके १७८४ को जब देवी व्यंकम्मा पंचतत्त्व में लीन हुईं तब श्रीप्रभु ने स्वयं अपनी देखरेख में वैदिक विधि-विधान के साथ देवी की समाधिविधि पूर्ण करवाई। उस समय पर किसी भक्त ने श्रीप्रभु के समक्ष श्रीदेवी व्यंकम्मा के समाधि मंदिर के निर्माण का विषय निकाला तो श्रीप्रभु ने कहा “जब उसे मंदिर बनवाना होगा तब वह अपने सामर्थ्य के बल पर मंदिर का निर्माण अवश्य करवाएगी। हमें उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए।”

श्रीप्रभु की इस उक्ति के अनुसार श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज के कार्यकाल में ३० वर्ष बाद देवी व्यंकम्मा के भव्य समाधि मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। श्री रावजीबुवा के नेतृत्त्व में मुंबई के प्रभुभक्तों ने इस मंदिर के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंदिर के पूर्ण होने पर श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज ने शुभमुहूर्त पर देवी व्यंकम्मा की समाधि पर विधिवत् श्रीचक्र की स्थापना की और तभी से श्रीसंस्थान में देवी व्यंकम्मा की उपासना भगवान्‌ दत्तात्रेय की शक्ति मधुमती श्यामला के रूप में की जाती है।

श्री सदगुरु मार्तंड माणिकप्रभु महाराज ने देवी व्यंकम्मा की महिमा को उजागर किया और भक्तजनों को देवी की अलौकिक लीलाओं का परिचय करवाया। श्रीदेवी की स्तुति में महाराजश्री द्वारा रचित जो पद आज हम गाते हैं उन पदों में महाराजश्री ने देवी व्यंकम्मा के आध्यात्मिक स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया है। देवी के जिस दिव्य स्वरूप के दर्शन महाराजश्री ने पाए थे और जो कृपा उन्होंने प्राप्त की थी उसी अनुभूति को महाराजश्री ने अपनी सुंदर रचनाओं के माध्यम से हमारे लिए अभिव्यक्त किया है।

श्रीजी अपनी एक रचना में कहते हैं – ज्ञान विज्ञान मूल योनी। पंचकोषात्मक सिंहासनीं। जीव शिव मिथुन सौख्यदानी। चिन्मधुपानीं मग्नगानीं। तोची जगि शाक्त भावना त्यक्त सहज स्थितिमुक्त आत्मरतिसक्त। बालमार्तांड पादवंदी। जय जय उदो सदानंदी।। – जो ज्ञान और विज्ञान (विशेष ज्ञान) का मूल स्रोत है, जो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनंदमय इन पांच कोषों के सिंहासन पर आसीन होकर जीव एवं ईश्वर इस जोड़ी को सुख प्रदान करती है, जो ज्ञानरूपी मधु का पान करनेवाली है, जो अपने ही आत्मसुख के गायन में मग्न है, उस भगवती मधुमती के चरणों में सच्चा शाक्त, जीवभाव का त्याग करनेवाला, सहजस्थिति में मुक्ति का अनुभव लेनेवाला मार्तंड नामक बालक विनम्र भाव से नतमस्तक है, हे सदैव आनंद देनेवाली अथवा सदा आनंदरूप ब्रह्म से संयुक्त रहनेवाली माता, तुम्हारी जय हो।।

श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज के ही काल में श्रावणमास में भगवती व्यंकम्मा की आराधना एवं आश्विनमास में मधुमती पंचरात्रोत्सव मनाने का क्रम प्रारंभ हुआ। महाराजश्री के काल से ही श्रीमधुमती पंचरात्रोत्सव यहॉं अत्यंत वैभवपूर्णरीति से मनाने की परंपरा रही है। संप्रति श्रीमधुमती पंचरात्रोत्सव आश्विन शुक्ल पंचमी से आश्विन शुक्ल नवमी तक माणिकनगर में अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जता है। पंचरात्रोत्सव के आरंभ के अवसर पर ललिता पंचमी के दिन श्रीजी पुण्याहवाचन संपन्न करते हैं। इसीके साथ श्री व्यंकम्मा मंदिर में घटस्थापन, मालाबंधन, अखंडदीपप्रज्ज्वालन, श्री देवी भागवत पारायण, चंडीपाठ, मल्लारी महात्म्य एवं मल्लारी सहस्रनाम पाठ इत्यादि कार्यक्रमों का श्रीगणेश होता है। पंचरात्रोत्सव के काल में नित्य सायं श्रीदेवी की लक्ष्मीसूक्तविधानपूर्वक पंचदशावर्तन श्रीसूक्त अभिषेक एवं सहस्रकुंकुमार्चन पूर्वक शोडषोपचार महापूजा संपन्न की जाती है। महापूजा के समय देवीमंदिर में सांप्रदायिक भजन के कार्यक्रम में सभी भक्तजन सहभागी होते हैं। महापूजा के पश्चात श्रीजी प्रदोषपूजा एवं कुमारिकापूजन संपन्न करते हैं।  दुर्गाष्टमी के अवसर पर श्री देवी की विशेष महापूजा संपन्न की जाती है। महानवमी के दिन श्रीजी नवचंडी याग की पूर्णाहुति संपन्न करते हैं एवं रात्रि प्रदोषपूजा के पश्चात सरस्वतीपूजन एवं घटोत्थापन के साथ श्री मधुमती पंचरात्रोत्सव सुसंपन्न होता है। इस काल में संपूर्ण माणिकनगर दिन-रात भजन-पूजन इत्यादि कार्यक्रमों में व्यस्त रहता है एवं सारा वातावरण देवीभक्ति से सराबोर होता है।

तो आइए, इस मंगलमय अवसर पर अपने परमप्रिय श्रीगुरु के भक्तों को वर प्रदान करने के लिए सज्ज भगवती मधुमती श्यामला के चरणों में नतमस्तक होकर श्रीजी के स्वर में स्वर मिलाकर गाएं – ‘‘व्यंकानाम जगज्जननी कुलभूषण ही अवतरली हो। शंका भ्रम चंड मुंड मर्दिनी रंकाऽमर पद देई हो।। पद्मासनी शुभ शांत मुद्रा। शुभ्रांबर कटि कसली हो। परमप्रिय गुरुभक्तां सुखकर। वरदेण्या ही सजली हो।।’’

(इस वर्ष श्रीदेवी पंचरात्रोत्सव बुधवार २१ से शनिवार २४ अक्तूबर तक माणिकनगर में परंपरानुसार संपन्न होगा। इस कालावधि में भजन पूजनादि कार्यक्रमों में सहभागी होकर भगवती मधुमतीश्यामला की कृपा संपादित करें)

गुरुमंत्र

एक राजा था। उसके राज्य में एक साधु रहा करता था। राज्य के अनेक लोग उस साधु के शिष्य बन गए थे। साधु की कीर्ति राजा तक पहुँची। राजा के मन में उस साधु से मिलने की इच्छा जागृत हुई और एक दिन राजा उस साधु के आश्रम में जा पहुँचा। राजा ने साधु को नमस्कार किया और कहा – ‘‘महाराज, मेरे राज्य के अनेक लोग आपके शिष्य हो गए हैं, आपने अनेक लोगों का उद्धार किया है, आपके उपदेश के फलस्वरूप अनेकों की आध्यात्मिक उन्नति हुई है, कृपाकर आप मुझे भी उपदेश दें और मेंरी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें।’’ राजा की अपेक्षा थी कि साधु कोई चमत्कार करेगा, सिर पर हाथ धरकर शक्तिपात दीक्षा देगा अथवा पीठ में धूंसा मारकर कुंडलिनी जागृत कर देगा। साधु ने ऐसा कुछ नहीं किया; उसने राजा से कहा – ‘‘राजन्, तुम नित्य एक सहस्र बार ‘राम राम’ इस मंत्र का जप करो।’’ साधु के इस उपदेश को सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने कहा – ‘‘महाराज, मैं तो बड़ी अपेक्षा लेकर आपके पास आया था, आपने मुझे ‘राम राम’ का सीधा सादा उपदेश दे डाला। यह तो कोई भी बता सकता है, पुस्तकों में भी लिखा हुआ है, इतनी दूर आकर मुझे क्या मिला?’’ साधु मुस्कुराया और उसने कहा “राजन्, मैं तो बस इतना ही जानता हूँ, लेकिन समय आने पर तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तुम्हें अवश्य दूंगा।’’  राजा निराश होकर अपने महल में लौट आया।

कुछ दिनों बाद एक दिन राजा अपने दरबार में सिंहासन पर बैठा हुआ था। उसके आसपास उसके मंत्री, सेनापति, सिपाही आदि खड़े थे। तभी अचानक वह साधु दरबार में आया और आते ही उसने ऊँची आवाज़ में कहा-‘‘सिपाहियों, इस राजा को गिरफ्तार कर लो, इसे बंदी बना लो, यह मेंरी आज्ञा है।’’ सिपाही साधु के इस विचित्र आचरण को देखकर विस्मित हो गए, किंतु कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला। इस पर और अधिक क्रोधित होते हुए साधु ने सेनापति से कहा – ‘‘सेनापति, तुमने मेंरी आज्ञा नहीं सुनी? मैं कहता हूँ, इस राजा को हथकड़ी पहनाकर तुरंत कैदखाने में डाल दो।’’ राजा अब तक साधु के इस विचित्र व्यवहार को खामोश रहकर देख रहा था किंतु अब उसकी सहनशीलता समाप्त हो गई, उसने चिल्लाकर कहा – ‘‘सिपाहियों, इस उदंड साधु को तुरंत बंदी बना लो।’’ राजा की आज्ञा सुनते ही सिपाहियों ने साधु को गिरफ्तार कर लिया। साधु हँसने लगा, उसने कहा – ‘‘राजन्, तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिल गया? जब मैंने सिपाहियों को तुम्हें बंदी बनाने की आज्ञा दी तब एक भी सिपाही अपनी जगह से नहीं हिला किंतु जैसे ही तुमने मुझे बंदी बनाने की आज्ञा दी, सारे सिपाही मुझ पर टूट पड़े। शब्दों में स्वयं की अपनी कोई शक्ति नहीं होती बोलनेवाले की शक्ति ही शब्दों को सामर्थ्य प्रदान करती है। उस दिन जब मैंने तुम्हें ‘राम राम’ का उपदेश दिया था, तब तुमने कहा था कि यह तो साधारण सा नाम है, कोई भी बता सकता है, पुस्तकों में हैं, किंतु तुम भूल गए कि कोरे शब्दों के पीछे शक्ति नहीं होती। राम का नाम जब गुरुमुख से प्राप्त होता है, तब उन शब्दों के पीछे उस गुरु की समस्त साधना का उसकी अपनी गुरुपरंपरा का बल होता है, जो उन साधारण लगनेवाले शब्दों में असाधारण ऊर्जा का संचार कर देता है। इसीलिए नामजप के लिए गुरुमुख से नाम प्राप्त करने की हमारी प्राचीन परंपरा रही है। साधु की वाणी को सुन राजा हतप्रभ हो गया एवं उसी दिन विधिवत् गुरु उपदेश प्राप्त कर उसने अपनी साधना का श्रीगणेश किया।

श्रीप्रभु महाराज द्वारा स्थापित संप्रदाय में भी गुरु-उपदेश का अनन्य साधारण महत्व है। प्रभु महाराज स्वयं कहते हैं – ‘‘जब मुरशद ने कान फूंका। खुल गई आँखां मुझे मैं देखा॥’’ महाराजश्री ने इसीलिए गुरुमंत्र की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है – ‘‘असा गुरुमंत्र असा गुरुमंत्र। तुटे समूळ संसृति सूत्र॥’’ गुरुमंत्र की महिमा से संसार के सारे दु:ख समूल नष्ट हो जाते हैं। अस्तु गुरु-उपदेश के वास्तविक अर्थ एवं माहात्म्य को जानकर आप सभी संसार के दुःखों से मुक्त होने की दिशा में प्रयत्न करें और उस प्रयत्न में प्रभुकृपा से आप सफल हों ऐसा मंगल आशीर्वाद प्रेषित करता हूँ।

गुरुवाणी

एक बार नारदजी की हनुमानजी से भेंट हुई। दोनों परम भक्त, दोनों ज्ञानी और दोनों अतीव बुद्धिमान्। कुशल-क्षेम के पश्चात् नारदजी ने अपने स्वभाव के अनुसार हनुमानजी को छेड़ना प्रारंभ कर दिया। नारदजी ने कहा – “हनुमान्! तुम निस्संदेह सर्वश्रेष्ठ भक्त हो, तुम्हारी भक्ति अनुपम है, प्रभु के प्रति तुम्हारी निष्ठा अडिग है। तुम्हारा सेवा-भाव अनूठा है, तथापि इन सभी सद्गुणों के होते हुए भी तुम्हारी भक्ति को परिपूर्ण नहीं कहा जा सकता!” भक्तिशास्त्र के आचार्य नारदजी के ऐसे वचन सुनकर हनुमानजी आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने कहा – “क्यों मुझ में क्या कमी है, जो आप ऐसा कह रहे हैं?” नारदजी ने कहा कि तुम्हारे एक पाप के कारण तुम्हारी भक्ति को परिपूर्ण भक्ति नहीं कहा जा सकता। इस पर हनुमानजी तुनक कर बोले – “कौनसा पाप?” नारदजी ने कहा – “लंका में रावण ने जब तुम्हारी पूँछ में आग लगाई तब तुमने लंका को ही जला डाला, लंका में लगी उस भीषण आग में अनेक निरपराध राक्षस मारे गए। अनेक गर्भवती राक्षसियों का गर्भपात हुआ। तुम्हरी शत्रुता रावण से थी, उसका तो तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाए, उलटे तुमने निरपराध राक्षसों को आग में जलाकर मार डाला। यही पाप तुम्हारी भक्ति पर लगा कलंक है।” नारद के इन आरोपों को सुनकर हनुमान् मुस्कुराए। हनुमानजी ने अपने बुद्धिमतां वरिष्ठम् इस ब्रीद को सार्थ करते हुए नारद को समर्पक उत्तर देते हुए कहा – “जब मैंने लंकानगरी पर उड़ान भरी तब यह देखा कि उस नगरी में किसी के भी मुख में राम का नाम नहीं था। जिसके मुख में राम का नाम नहीं होता, वह मुर्दा होता है। मुर्दो को जलाकर सद्गति देना पुण्य का काम है और मैंने वही पुण्य का काम किया है, मैंने कोई पाप नहीं किया।” हनुमानजी के इस चातुर्य पर नारदजी प्रसन्न हुए और उन्होंने दृढ़ आलिंगन से हनुमानजी का अभिनंदन किया।

हनुमानजी ने जो कहा वह शत प्रतिशत सत्य है। हम देखते हैं कि जब शवयात्रा चलती है तब अर्थी पर लेटे मुर्दे के अतिरिक्त शेष सभी लोग राम का नाम लेते हुए चलते हैं; केवल मुर्दा ही राम का नाम नहीं लेता। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है – यस्याखिलामीवहभिः सुमंगलै: वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः। प्राणंति शुंभन्ति पुनंति वै जगत् यास्तद्विरक्ता: शवशोभना मता:॥ अर्थात् उसके गुण, चरित्र, अवतार मंगलमय हैं, उसके श्रवण चिंतन से सकल पापों का नाश होता है, उसका वर्णन करनेवाली वाणी जगत् को चैतन्य व शोभा देती है, जो वाणी उसका वर्णन नहीं करती वह कितनी भी मधुर क्यों न हो, सज्जन उसे प्रेत का अलंकार ही मानते हैं।

प्रभु महाराज भी कहते हैं – भजन बिना तू सुन नर मूरख। मुर्दा काहे को सिंगारा रे। जो मुख भजन नहीं करता, प्रभु का नाम नहीं लेता, वह मुर्दे के समान है। क्योंकि एक अकेला परमात्मा ही चेतन है, उसके अतिरिक्त बाकी सब जड है। चैतन्यरूप परमात्मा की विस्मृति जडता नहीं तो और क्या है? परमात्मा के स्मरण का एकमेव साधन उसका नाम है। अत: मन से प्रभु का स्मरण और वाणी से प्रभुनाम का उच्चारण निरंतर होना चाहिए। और यह भी स्मरण रहे कि प्रभु का नाम लेने की बुद्धि भी चंद भाग्यवानों में ही उदित होती है। अत: मन-बुद्धि-वाणी में प्रभुनाम को धारण करने की बुद्धि आप में जाग्रत हो, ऐसा शुभाशीर्वाद प्रेषित करता हूँ।

अधिकमास में गीता ज्ञानयज्ञ

१८ सितंबर से अधिकमास का आरंभ होने जा रहा है। कहा गया है अधिकस्य अधिकं फलम्‌ – अधिक मास के दौरान अधिक से अधिक समय जप-तप, अनुष्ठान में व्यतीत करने से हमारी साधना को विशेष बल मिलता है। गत कुछ दिनों से संस्थान के कार्यालय से संपर्क करके कईं भक्तजनों ने जानना चाहा कि आने वाले इस अधिकमास में हम भक्तजनों के लिए श्रीजी की क्या आज्ञा है? कहा जाता है, कि अधिकमास में कुछ विशेष साधना करनी चाहिए कुछ धार्मिक कर्म करने चाहिए। तो ऐसी कौनसी साधना है जो हम इस अधिकमास में करें, जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए श्रेयस्कर हो? इस प्रश्न को लेकर संस्थान के कार्यालय को अनेक भक्तजनों के फोन आए। वैसे तो सभी सांप्रदायिक सद्भक्त गुरु आज्ञानुसार अपनी-अपनी साधना में नियमितरूप से लगे रहते हैं परंतु जब ऐसा कोई विशेष पर्व या अवसर आता है तो भक्तजन श्रीजी के निर्देश के लिए उनकी अनुज्ञा के लिए उत्सुक रहते हैं। भक्तजनों की यही इच्छा होती है, कि किसी भी प्रकार के व्रत-अनुष्ठान को आरंभ करने से पहले वे अपने सद्गुरु की अनुज्ञा पा लें। अपनी समझ के अनुसार या किसी के कहने पर हम सब समय-समय पर विविध प्रकार की छोटी-बड़ी उपासनाऍं करते हैं परंतु अपने सद्गुरु द्वारा बताए हुए उपासना क्रम को निष्ठापूर्वक पूर्ण करने का समाधान कुछ अलग ही होता है। कुछ दिनों पहले हमने श्रीजी के समक्ष यह बात रखी और उनसे पूछा, कि सांप्रदायिक सद्भक्तों के लिए अधिकमास में आचरणयोग्य कोई अनुष्ठान बताऍं तो श्रीजी ने कहा ‘‘अद्वैत बोधू आम्ही हाची हो आमुचा धंदा। वेदांत का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है क्योंकि वेदांत शास्त्र के नियमित अध्ययन के बिना आध्यात्मिक साधना फलीभूत नहीं हो सकती। हम इस एक माह की कालावधि में श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से वेदांत शास्त्र का अध्ययन करेंगे।’’ हम सभी भक्तजनों पर श्रीजी की यह बहुत बड़ी कृपा हुई है, ऐसा मेरा मानना है। वेदांत शास्त्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए तथा सभी जिज्ञासुओं के लिए सीखने का यह एक स्वर्णिम अवसर है।
दैनंदिन जीवन में हम सब अपने काम-काज में इतने व्यस्त हो जाते हैं, कि वेदांत के अभ्यास को गंभीरता से नहीं लेते। मेरे पास उतना समय नहीं है – ऐसा कहकर बहाना बना लेते हैं। यह अधिकमास इसीलिए आता है, कि प्रायः हम जो ठीक से नहीं कर पाते उसे भरपूर समय दें और अपनी जीवनशैली के साथ उसे शाश्वतरूप से जोड़कर आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त करें। समय का नियोजन कैसे करना चाहिए यह भगवान्‌ ने बताया है: युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। इस श्लोक का तात्पर्य यह है, कि युक्त आहार-विहार करने वाले, यथायोग्य परिश्रम करने वाले और यथायोग्य सोने-जागने वाले योगी के सभी प्रकार के दुःख समाप्त हो जाते हैं। जो यथोचित आहार लेते हैं, योग व्यायामादि के लिए यथायोग्य समय देते हैं, योग्यरीति से कर्तव्य कर्म में रत रहते हैं और समयोचित पद्धति से सोते और जागते हैं, ऐसे साधक सदा दुःख से दूर रहते हैं। हम सब अपनी दिनचर्या में आहार, विहार, व्यवसाय तथा निद्रा के लिए नियमितरूप से भरपूर समय देते हैं परंतु अवबोधन के लिए समय नहीं दे पाते। वास्तव में अवबोध का अर्थ है जानना परंतु यहॉं भगवान्‌ जानने को ही सही अर्थ में जागना कह रहे हैं। जिनके जीवन में अध्यात्म का महत्व है ऐसे साधकों को प्रतिदिन नियमितरूप से अवबोधन के लिए अर्थात्‌ आध्यात्मिक साधना के लिए समय निकालना ही चाहिए। वेदांत का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना ही सही अर्थ में जागना है क्योंकि वेदांत विचार के कारण ही हम मोहनिद्रा से जागते हैं। भगवान्‌ ने तो हमें आदेश दिया है परंतु क्या हम प्रतिदिन वेदांत चिंतन के लिए समय निकालते हैं? यह अधिकमास उसी अवबोधन का एक अवसर है। जिस काम के लिए हम प्रायः समय नहीं देते उसी काम को ठीक से करने का यह एक अच्छा अवसर मिल रहा है। सोना कैसे है यह तो हम सबको बहुत अच्छे से पता है परंतु जागते कैसे हैं इसका अभ्यास इस अधिकमास में हमें करना है। मोहनिद्रा से हम सबको जगाने के लिए हमारे सद्गुरु इस अधिकमास के दौरान संपूर्ण एक महीने की कालावधि में श्रीमद्भगवद्गीता पर नित्य प्रवचन करने वाले हैं। श्रीजी का हम भक्तजनों पर जो असीम प्रेम है, उनका जो वात्सल्य है वही उनकी वाणी के माध्यम से हम सब पर बरसने वाला है। वर्तमान परिस्थिति के कारण श्रीजी का प्रवचन यूट्यूब के माध्यम से लाइव प्रसारित किया जा रहा है जिससे घर बैठे-बैठे ही हम प्रवचन का लाभ उठा सकें। सभी उत्सुक श्रोतोओं को एक और महत्वपूर्ण जानकारी यह भी देनी है, कि प्रवचन के विषय से संबंधित आप के प्रश्न आप ९४४८४६९९१३ इस वाट्सॅप नंबर पर लिखकर भेज सकते हैं। श्रीजी अपने व्याख्यान के समय उन प्रश्नों के उत्तर देकर आपकी शंकाओं का समाधान करेंगे।
हमने सुन रखा है, कि सत्संग में उपस्थित रहने से पुण्य मिलता है। इसलिए बहुत से लोग पुण्य कमाने मात्र के लिए सत्संग में जाकर बैठते हैं। सत्संग में उपस्थित रहने मात्र से पुण्य की प्राप्ति तो अवश्य होती है परंतु वास्तव में जो होना चाहिए वह नहीं हो पाता। इसलिए नहीं होता क्योंकि हम अक्सर सत्संग में जो सुनते हैं उन बातों को उसी पंडाल में छोड़ कर चले आते हैं। अज्ञान का अंधकार मिटाकर साधकों को उनके ज्ञानस्वरूप का साक्षात्कार करवाना ही सत्संग का मुख्य प्रयोजन है। कथाओं में और प्रवचनों में जो कुछ हम श्रवण करते हैं उसपर मनन और चिंतन यदि नहीं हुआ तो वह श्रवण व्यर्थ है। जैसे, भोजन के बाद पचन की प्रक्रिया ठीक से यदि नहीं हुई तो शरीर को भोजन का कोई लाभ नहीं होता उसी प्रकार श्रवण के बाद मनन-चिंतन यदि ना हो तो उस श्रवण का भी लाभ नहीं होता। प्रवचन को केवल सुनने मात्र से हमारे भीतर कोई परिवर्तन होने वाला नहीं है। यह अत्यंत अनिवार्य है, कि श्रीजी के वचनामृत का श्रवण करने के बाद हम मनन एवं चिंतन के लिए भी समय निकालें। श्रवण के पश्चात्‌ पर्याप्त समय मनन-चिंतन में बिताने का नाम ही अवबोधन है और भगवान्‌ ने इसी प्रक्रिया को जागना कहा है। नित्य सायं एक घंटे के लिए हम श्रीजी के मुखकमल से गीता का श्रवण करने वाले हैं तो दिनभर में कम से कम एक घंटे का समय तो हमें उस विषय के विचार को देना ही चाहिए। हम ऐसा नहीं कह सकते कि सुनने मात्र का समय हमारे पास है लेकिन मनन, चिंतन वगैरा हम नहीं कर पाएंगे। श्रवण, मनन और निदिध्यासन यह एक संपूर्ण प्रक्रिया है और जो विधिवत्‌ इस प्रणाली का अनुकरण करते हैं वही अध्यात्म साधना में सफल होते हैं। यह बात भी सत्य है, कि अनेक प्रभुभक्त इस अधिकमास के दौरान विविध प्रकार के अनुष्ठान आदि करने वाले हैं। माणिकनगर में विष्णुयाग का आयोजन हो रहा है, कईं लोग अपने-अपने घरों में पारायण, भजन, जप आदि करने वाले हैं परंतु इन सभी व्यस्तताओं के बावजूद हमें अवबोधन के लिए समय निकालना ही चाहिए। विविध प्रकार के साधनों में फंसे रहने से बेहतर है कि हम नियमितरूप से वेदांत विचार के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करें क्योंकि यह ज्ञानयज्ञ हमारे लिए परमश्रेयस्कर है। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।। अन्य सभी प्रकार के यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञान ही संपूर्ण कर्मों की पराकाष्ठा है। ऐसा स्वयं भगवान्‌ गीता में कहते हैं। सकलमत संप्रदाय के अनुयायी होने के नाते हमारा यह परम कर्तव्य बनता है, कि हम एक महीने तक नित्य चलने वाले इस ज्ञानयज्ञ का संपूर्ण लाभ उठाऍं। जो अपने जीवन को परिवर्तित करना चाहते हैं, जो अध्यात्म में प्रगति करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का अभ्यास अत्यंत अनिवार्य है। गीता का यह अभ्यास मोहनिद्रा से जागने की प्रक्रिया है और मोहनिद्रा इतनी गहरी है कि जागने के लिए प्रयत्न आवश्यक है।
शुक्रवार १८ सितंबर २०२० से नित्य शाम ६ बजे श्रीजी श्रीमद्भगवद्गीता पर प्रवचन करेंगे और यह क्रम एक संपूर्ण एक माह तक अर्थात्‌ १६ अक्तूबर २०२० तक चलने वाला है। यह व्याखानमाला केवल इसीलिए आयोजित की जा रही है, कि हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश फैले और हमारा उद्धार हो। एक गुरु होने के नाते श्रीजी तो अपना कार्य अत्यंत दक्षता से कर रहे हैं परंतु शिष्य होने के नाते हमें अपने कर्तव्य को ठीक से समझकर इस अवसर का सही लाभ उठाना चाहिए। अपनी अनेक व्यस्तताओं को महत्व न देकर हम भक्तजनों के उद्धारहित श्रीजी अपना समय निकालकर इस ज्ञानयज्ञ के माध्यम से हम पर जो उपकार कर रहे हैं उसके लिए मैं सभी की ओर से श्रीजी के चरणों में कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता हूँ।

श्रीगणपति विसर्जन

श्रीगणेश चतुर्थी से लेकर ११ दिनों तक प्रभु मंदिर में श्रीगणेशोत्सव संपन्न हुआ। इस वर्ष करोना महामारी के चलते प्रतिवार्षिक धूमधाम का अभाव होते हुए भी संपूर्ण विधिविधानपूर्वक श्रीगणेशोत्सव के कार्यक्रम संपन्न हुए। मंगलवार १ सितंबर की रात्रि को श्रीजी ने श्रीगणेशजी की विशेष प्रदोषपूजा संपन्न की। मंत्रजागर के पश्चात्‌ अत्यंत लघुप्रमाण पर श्रीगणेशजी की शोभायात्रा संपन्न होकर प्रतिमा का विसर्जन किया गया।