श्रीगुरु आराधना उत्सव

मंगलवार ३ नवंबर २०२० को श्री सिद्‌धराज माणिकप्रभु महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर श्रीजी ने श्रीपादुकाओं की महापूजा संपन्न की। दोपहर में मुक्तिमंटप में श्रीजी ने महाराजश्री का सांवत्सरिक श्राद्ध संपन्न किया। आज पुण्यतिथि निमित्त महाराजश्री की आराधना का कार्यक्रम परंपरानुसार संपन्न हुआ। ३ से ८ नवंबर तक चल रहे श्री गुरु आराधना उत्सव के अंतर्गत नित्य सायं श्रीप्रभु मंदिर के कैलास मंटप में सातवार भजन का कार्यक्रम संपन्न हो रहा है। रविवार ८ नवंबर को श्री मनोहर माणिकप्रभु महाराज की आराधना के अवसर पर आराधना संपन्न की जाएगी। इस अवसर पर शाम के समय कीर्तन एवं भजन के कार्यक्रम आयोजित किए जाऍंगे।

क्रिकेट टूर्नामेंट २०२०

दिनांक १ नवंबर को माणिकनगर के नवनिर्मित क्रिकेट क्रीडांगण में ११वां श्री सिद्धराज माणिकप्रभु क्रिकेट प्रतियोगिता का फाइनल मॅच खेला गया। इस प्रतियोगिता में कुल ८ टीमों ने भाग लिया था। माणिकनगर की माणिक सोपर्ट्‌स एकॅडमी और कलबुरगी की ख्वाजा बंदा नवाज़ क्रिकेट क्लब के बीच हुए फाइनल मॅच में के.बी.एन कलबुरगी की टीम ने विजय प्राप्त की। माणिकनगर, हुमनाबाद तथा समीपस्थ स्थानों के क्रीडा प्रेमियों ने बड़ी संख्या में उपस्थित रहकर मॅच का आनंद लिया।

मॅच के उपरांत श्रीजी की दिव्य सन्निधि में पुरस्कार वितरण समारोह संपन्न हुआ। विशेष बात यह रही कि, इस वर्ष की प्रतियोगिता का आयोजन नवनिर्मित सिद्धराज क्रिकेट ग्रांउड में हुआ। क्रिकेट के इस मैदान में पांच टर्फ पिच बने हैं। क्रिकेट से और खेल कूद की अनेक विधाओं से ब्रह्मलीन श्रीजी का जो लगाव था उसको ध्यान में रखते हुए माणिकनगर में गत अनेक वर्षों से विविध क्रीड़ा प्रतियोगिताऍं आयोजित की जा रही हैं।

एम.एस.ए द्वारा खेल को बढ़ावा देने का जो कार्य निरंतर कईं वर्षों से चल रहा है उस कार्य में इस मैदान ने चार चांद लगा दिए हैं। इस मैदान से लग कर ही एक सुंदर फुटबॉल का भी मैदान बन रहा है। इस परिसर में क्रिकेट ग्राउंड, फुटबॉल ग्राऊंड, इंडोर बॅडमिंटन कोर्ट, स्विमिंग पूल, एथलेटिक ग्राऊंड तथा बास्केट बॉल कोर्ट भी बनाए गए हैं और आने वाले समय में इस प्रांत के युवा खिलाड़ी इस क्रीडा संकुल का भरपूर लाभ उठाएंगे इसमें कोई संदेह नहीं है। भविष्य में इस क्रिकेट मैदान पर रंजी स्तर के भी मॅच हो सकते हैं ऐसी संभावनाऍं हैं।

क्रीडा पोषक पुरस्कार

स्वनामधन्य श्री सद्गुरु सिद्धराज माणिकप्रभु महाराज ने माणिकनगर में खेल की जो विविध गतिविधियॉं प्रारंभ की थी उसके परिणामस्वरूप आज माणिकनगर इस प्रांत का एक महत्वपूर्ण क्रीडा केंद्र बन चुका है। सन्‌ १९६२ में श्रीमाणिकप्रभु क्रीडा मंडल की स्थापना करके महाराजश्री ने इस प्रांत को पहली बार क्रिकेट के खेल से परिचित कराया। उन्होंने वॉलीबॉल, खोखो और कब्बडी के अनेक बड़ी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया। महाराजश्री के नेतृत्त्व में माणिकनगर में प्रतिवर्ष बड़े पैमाने पर भव्य क्रिकेट का टूर्नामेंट आयोजित होता था जिसमें वे स्वयं खेला करते थे। खेतों में हसिया और फावड़ा चलाने वाले ग्रामीण युवाओं के हाथों में बल्ला थमाकर उनकी प्रतिभा का जो परिचय श्रीजी ने दुनिया को दिया उसको आज हम चमत्कार ही कह सकते हैं। इस टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए और इसे देखने के लिए दूर-दूर से क्रीडाप्रेमी माणिकनगर आते थे। अधिक से अधिक युवाओं को मैदान में लाकर उनकी प्रतिभानुसार किसी न किसी खेल से उन्हें श्रीजी ने जोड़ा और इस प्रांत में खेल की संस्कृति को बढ़ावा दिया। श्रीजी का मानना था कि समाज को आपस में जोड़कर रखने का और एकता बढ़ाने का यदि सबसे अच्छा कोई माध्यम है तो वह खेल ही है। इसलिए, समाज में समन्वय स्थापित करने का जो कार्य प्रभु ने २०० वर्षों पूर्व आरंभ किया था उसी कार्य का ब्रह्मलीन महाराजश्री ने खेल के माध्यम से  विस्तार किया। श्रीजी के इस दिव्य प्रयास के फलस्वरूप आज माणिकनगर का नाम खेल की दुनियॉं में अत्यंत आदर से लिया जाता है। आज इस प्रांत के लगभग सभी क्रीडाप्रेमी का यह स्वप्न होता है, कि वह कम से कम एक बार तो माणिकनगर के मैदान पर खेले।

खेल के संवंर्धन की दिशा में माणिकनगर में गत ६० वर्षों से जो कार्य हुआ है उससे प्रभावित होकर कर्नाटक सरकार ने इस वर्ष का क्रीडा पोषक पुरस्कार माणिक स्पोर्ट्‌स एकॅडेमी को दिया है। सोमवार २ नवंबर को कर्नाटक राज्योत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में बेंगलूरू में माननीय मुख्य मंत्री की उपस्थिति में क्रीडा मंत्री श्री सी.टी रवि जी  ने श्री आनंदराज जी को ‘क्रीडा पोषक’ पुरस्कार से सन्मानित किया। यह हब सब के लिए अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है, कि माणिकनगर के क्रीडा प्रकल्पों की सराहना आज राज्य स्तर हुई है। हम इस अवसर पर श्रीजी के दिव्य कार्य का स्मरण करते हुए उन्हें कृतज्ञता पूर्वक नमन करते हैं। श्री आनंदराज जी के नेतृत्व में क्रीडा के क्षेत्र में आज जो कार्य यहॉं चल रहा है वह अत्यंत प्रशंसनीय है और इस नूतन उपलब्धि के लिए हम उनका हार्दिक अभिनंदन करते हैं। हम श्रीमाणिकप्रभु क्रीडा मंडल के सभी वरिष्ठ सदस्यों का तथा वर्तमान खिलाडियों का भी अभिनंदन करते हैं।

अधिकमास में गीता ज्ञानयज्ञ

१८ सितंबर से अधिकमास का आरंभ होने जा रहा है। कहा गया है अधिकस्य अधिकं फलम्‌ – अधिक मास के दौरान अधिक से अधिक समय जप-तप, अनुष्ठान में व्यतीत करने से हमारी साधना को विशेष बल मिलता है। गत कुछ दिनों से संस्थान के कार्यालय से संपर्क करके कईं भक्तजनों ने जानना चाहा कि आने वाले इस अधिकमास में हम भक्तजनों के लिए श्रीजी की क्या आज्ञा है? कहा जाता है, कि अधिकमास में कुछ विशेष साधना करनी चाहिए कुछ धार्मिक कर्म करने चाहिए। तो ऐसी कौनसी साधना है जो हम इस अधिकमास में करें, जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए श्रेयस्कर हो? इस प्रश्न को लेकर संस्थान के कार्यालय को अनेक भक्तजनों के फोन आए। वैसे तो सभी सांप्रदायिक सद्भक्त गुरु आज्ञानुसार अपनी-अपनी साधना में नियमितरूप से लगे रहते हैं परंतु जब ऐसा कोई विशेष पर्व या अवसर आता है तो भक्तजन श्रीजी के निर्देश के लिए उनकी अनुज्ञा के लिए उत्सुक रहते हैं। भक्तजनों की यही इच्छा होती है, कि किसी भी प्रकार के व्रत-अनुष्ठान को आरंभ करने से पहले वे अपने सद्गुरु की अनुज्ञा पा लें। अपनी समझ के अनुसार या किसी के कहने पर हम सब समय-समय पर विविध प्रकार की छोटी-बड़ी उपासनाऍं करते हैं परंतु अपने सद्गुरु द्वारा बताए हुए उपासना क्रम को निष्ठापूर्वक पूर्ण करने का समाधान कुछ अलग ही होता है। कुछ दिनों पहले हमने श्रीजी के समक्ष यह बात रखी और उनसे पूछा, कि सांप्रदायिक सद्भक्तों के लिए अधिकमास में आचरणयोग्य कोई अनुष्ठान बताऍं तो श्रीजी ने कहा ‘‘अद्वैत बोधू आम्ही हाची हो आमुचा धंदा। वेदांत का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है क्योंकि वेदांत शास्त्र के नियमित अध्ययन के बिना आध्यात्मिक साधना फलीभूत नहीं हो सकती। हम इस एक माह की कालावधि में श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से वेदांत शास्त्र का अध्ययन करेंगे।’’ हम सभी भक्तजनों पर श्रीजी की यह बहुत बड़ी कृपा हुई है, ऐसा मेरा मानना है। वेदांत शास्त्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए तथा सभी जिज्ञासुओं के लिए सीखने का यह एक स्वर्णिम अवसर है।
दैनंदिन जीवन में हम सब अपने काम-काज में इतने व्यस्त हो जाते हैं, कि वेदांत के अभ्यास को गंभीरता से नहीं लेते। मेरे पास उतना समय नहीं है – ऐसा कहकर बहाना बना लेते हैं। यह अधिकमास इसीलिए आता है, कि प्रायः हम जो ठीक से नहीं कर पाते उसे भरपूर समय दें और अपनी जीवनशैली के साथ उसे शाश्वतरूप से जोड़कर आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त करें। समय का नियोजन कैसे करना चाहिए यह भगवान्‌ ने बताया है: युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। इस श्लोक का तात्पर्य यह है, कि युक्त आहार-विहार करने वाले, यथायोग्य परिश्रम करने वाले और यथायोग्य सोने-जागने वाले योगी के सभी प्रकार के दुःख समाप्त हो जाते हैं। जो यथोचित आहार लेते हैं, योग व्यायामादि के लिए यथायोग्य समय देते हैं, योग्यरीति से कर्तव्य कर्म में रत रहते हैं और समयोचित पद्धति से सोते और जागते हैं, ऐसे साधक सदा दुःख से दूर रहते हैं। हम सब अपनी दिनचर्या में आहार, विहार, व्यवसाय तथा निद्रा के लिए नियमितरूप से भरपूर समय देते हैं परंतु अवबोधन के लिए समय नहीं दे पाते। वास्तव में अवबोध का अर्थ है जानना परंतु यहॉं भगवान्‌ जानने को ही सही अर्थ में जागना कह रहे हैं। जिनके जीवन में अध्यात्म का महत्व है ऐसे साधकों को प्रतिदिन नियमितरूप से अवबोधन के लिए अर्थात्‌ आध्यात्मिक साधना के लिए समय निकालना ही चाहिए। वेदांत का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना ही सही अर्थ में जागना है क्योंकि वेदांत विचार के कारण ही हम मोहनिद्रा से जागते हैं। भगवान्‌ ने तो हमें आदेश दिया है परंतु क्या हम प्रतिदिन वेदांत चिंतन के लिए समय निकालते हैं? यह अधिकमास उसी अवबोधन का एक अवसर है। जिस काम के लिए हम प्रायः समय नहीं देते उसी काम को ठीक से करने का यह एक अच्छा अवसर मिल रहा है। सोना कैसे है यह तो हम सबको बहुत अच्छे से पता है परंतु जागते कैसे हैं इसका अभ्यास इस अधिकमास में हमें करना है। मोहनिद्रा से हम सबको जगाने के लिए हमारे सद्गुरु इस अधिकमास के दौरान संपूर्ण एक महीने की कालावधि में श्रीमद्भगवद्गीता पर नित्य प्रवचन करने वाले हैं। श्रीजी का हम भक्तजनों पर जो असीम प्रेम है, उनका जो वात्सल्य है वही उनकी वाणी के माध्यम से हम सब पर बरसने वाला है। वर्तमान परिस्थिति के कारण श्रीजी का प्रवचन यूट्यूब के माध्यम से लाइव प्रसारित किया जा रहा है जिससे घर बैठे-बैठे ही हम प्रवचन का लाभ उठा सकें। सभी उत्सुक श्रोतोओं को एक और महत्वपूर्ण जानकारी यह भी देनी है, कि प्रवचन के विषय से संबंधित आप के प्रश्न आप ९४४८४६९९१३ इस वाट्सॅप नंबर पर लिखकर भेज सकते हैं। श्रीजी अपने व्याख्यान के समय उन प्रश्नों के उत्तर देकर आपकी शंकाओं का समाधान करेंगे।
हमने सुन रखा है, कि सत्संग में उपस्थित रहने से पुण्य मिलता है। इसलिए बहुत से लोग पुण्य कमाने मात्र के लिए सत्संग में जाकर बैठते हैं। सत्संग में उपस्थित रहने मात्र से पुण्य की प्राप्ति तो अवश्य होती है परंतु वास्तव में जो होना चाहिए वह नहीं हो पाता। इसलिए नहीं होता क्योंकि हम अक्सर सत्संग में जो सुनते हैं उन बातों को उसी पंडाल में छोड़ कर चले आते हैं। अज्ञान का अंधकार मिटाकर साधकों को उनके ज्ञानस्वरूप का साक्षात्कार करवाना ही सत्संग का मुख्य प्रयोजन है। कथाओं में और प्रवचनों में जो कुछ हम श्रवण करते हैं उसपर मनन और चिंतन यदि नहीं हुआ तो वह श्रवण व्यर्थ है। जैसे, भोजन के बाद पचन की प्रक्रिया ठीक से यदि नहीं हुई तो शरीर को भोजन का कोई लाभ नहीं होता उसी प्रकार श्रवण के बाद मनन-चिंतन यदि ना हो तो उस श्रवण का भी लाभ नहीं होता। प्रवचन को केवल सुनने मात्र से हमारे भीतर कोई परिवर्तन होने वाला नहीं है। यह अत्यंत अनिवार्य है, कि श्रीजी के वचनामृत का श्रवण करने के बाद हम मनन एवं चिंतन के लिए भी समय निकालें। श्रवण के पश्चात्‌ पर्याप्त समय मनन-चिंतन में बिताने का नाम ही अवबोधन है और भगवान्‌ ने इसी प्रक्रिया को जागना कहा है। नित्य सायं एक घंटे के लिए हम श्रीजी के मुखकमल से गीता का श्रवण करने वाले हैं तो दिनभर में कम से कम एक घंटे का समय तो हमें उस विषय के विचार को देना ही चाहिए। हम ऐसा नहीं कह सकते कि सुनने मात्र का समय हमारे पास है लेकिन मनन, चिंतन वगैरा हम नहीं कर पाएंगे। श्रवण, मनन और निदिध्यासन यह एक संपूर्ण प्रक्रिया है और जो विधिवत्‌ इस प्रणाली का अनुकरण करते हैं वही अध्यात्म साधना में सफल होते हैं। यह बात भी सत्य है, कि अनेक प्रभुभक्त इस अधिकमास के दौरान विविध प्रकार के अनुष्ठान आदि करने वाले हैं। माणिकनगर में विष्णुयाग का आयोजन हो रहा है, कईं लोग अपने-अपने घरों में पारायण, भजन, जप आदि करने वाले हैं परंतु इन सभी व्यस्तताओं के बावजूद हमें अवबोधन के लिए समय निकालना ही चाहिए। विविध प्रकार के साधनों में फंसे रहने से बेहतर है कि हम नियमितरूप से वेदांत विचार के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करें क्योंकि यह ज्ञानयज्ञ हमारे लिए परमश्रेयस्कर है। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।। अन्य सभी प्रकार के यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञान ही संपूर्ण कर्मों की पराकाष्ठा है। ऐसा स्वयं भगवान्‌ गीता में कहते हैं। सकलमत संप्रदाय के अनुयायी होने के नाते हमारा यह परम कर्तव्य बनता है, कि हम एक महीने तक नित्य चलने वाले इस ज्ञानयज्ञ का संपूर्ण लाभ उठाऍं। जो अपने जीवन को परिवर्तित करना चाहते हैं, जो अध्यात्म में प्रगति करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का अभ्यास अत्यंत अनिवार्य है। गीता का यह अभ्यास मोहनिद्रा से जागने की प्रक्रिया है और मोहनिद्रा इतनी गहरी है कि जागने के लिए प्रयत्न आवश्यक है।
शुक्रवार १८ सितंबर २०२० से नित्य शाम ६ बजे श्रीजी श्रीमद्भगवद्गीता पर प्रवचन करेंगे और यह क्रम एक संपूर्ण एक माह तक अर्थात्‌ १६ अक्तूबर २०२० तक चलने वाला है। यह व्याखानमाला केवल इसीलिए आयोजित की जा रही है, कि हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश फैले और हमारा उद्धार हो। एक गुरु होने के नाते श्रीजी तो अपना कार्य अत्यंत दक्षता से कर रहे हैं परंतु शिष्य होने के नाते हमें अपने कर्तव्य को ठीक से समझकर इस अवसर का सही लाभ उठाना चाहिए। अपनी अनेक व्यस्तताओं को महत्व न देकर हम भक्तजनों के उद्धारहित श्रीजी अपना समय निकालकर इस ज्ञानयज्ञ के माध्यम से हम पर जो उपकार कर रहे हैं उसके लिए मैं सभी की ओर से श्रीजी के चरणों में कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता हूँ।

कीर्तिमुख

कईं मंदिरों के मुख्य द्वार पर आपने एक विक्राल राक्षस का चेहरा बना हुआ देखा होगा।  बड़ी-बड़ी भयानक आंखे, मुह के बाहर लटकती लंबी जीभ और टेढ़े-मेढ़े दांतों वाला यह चहरा बड़ा ही उग्र होता है। परंतु देवालयों के मुख्य द्वार पर भला राक्षस का क्या काम? हमारे मन में ऐसा प्रश्‍न उठना स्वाभाविक है। मंदिरों के गोपुर पर, मुख्य महराब पर, अथवा दहलीज़ या चौखट पर भी यह विचित्र कलाकृति पायी जाती है। इस राक्षसी मुख को ‘कीर्तिमुख’ कहते हैं।

पुराणों में इस कीर्तिमुख का एक अत्यंत रोचक प्रसंग है। जालंधर नामक एक बहुत शक्तिशाली असुर था। जालंधर, माता पार्वती के रूप लावण्य से अत्यंत मोहित हो गया था और उसके मन में देवी से विवाह करने की कामना जाग्रत हुई थी। जालंधर ने राहु को दूत बनाकर माता पार्वती के पास अपना विवाह प्रस्ताव भेजा। राहू ने माता पार्वती को जालंधर का प्रस्ताव बताया और निर्लज्जतापूर्वक देवी के समक्ष जालंधर की प्रशंसा करने लगा। राहु की उन्मत्तता और दुःस्साहस को देखकर भगवान् शंकर अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला। भगवान् के तीसरे नेत्र से ज्वाला की एक बड़ी लपट आई और उस ज्वाला से एक प्रचंड राक्षस का जन्म हुआ। भगवान् ने उस राक्षस को आज्ञा दी, कि वह राहु को तुरंत खा जाए। वह भयानक राक्षस राहु से कद में कईं गुना विशाल था। भगवान् की आज्ञा पाकर वह राहू पर टूट पड़ा। राक्षस का विकराल रूप देखकर राहु अपने प्राणों की रक्षा के लिए डर के मारे भागने लगा। जब वह जान गया कि अब उस राक्षस से बचना असंभव है और उसका अंत निश्‍चित है, तब राहु भगवान् की शरण में जाकर क्षमा याचना करने लगा। भगवान् शंकर अत्यंत दयालु हैं और सदा शरणागत की रक्षा करते हैं। करुणावश भगवान् ने राहु को उसके जघन्य अपराध के लिए क्षमा कर दिया और उस राक्षस से कहा, कि राहु को जाने दो। अब उस राक्षस ने भगवान् से प्रश्‍न किया, कि प्रभु, मेरा जन्म तो केवल राहु को खाने के लिए हुआ था परंतु अब जो आपने राहु को क्षमा कर दिया तो मैं अपनी भूख कैसे मिटाऊँ? अब मैं किसको खाऊँ? भगवान् बोले ‘तुम अपने आप को ही खा जाओ।’ जैसे ही राक्षस ने यह सुना, वह अपने आप को ही खाने लगा। धीरे-धीरे वह एक-एक करके अपने अवयवों को खाने लगा। अपने पैर, जंघाएँ, पेट और हाथों को जब उसने खा लिया तब केवल उसका मुह शेष रह गया था। भगवान् ने जब देखा कि राक्षस ने आज्ञा का पालन करते हुए सचमुच स्वयं को खा लिया है, तब भगवान् अत्यंत हर्षित हुए। भगवान् बोले ‘पुत्र, तुमने मेरी आज्ञा का पालन करके स्वयं को ही खा लिया है। तुमने अपनी कीर्ति से मुझे संतुष्ट कर दिया है। इस पराक्रम के लिए मैं तुम्हे ‘कीर्तिमुख’ यह नाम देता हॅूं और आज के बाद मेरे दर्शन के लिए आए प्रत्येक भक्त को पहले तुम्हारे दर्शन लेने होंगे।’

इसीलिए मंदिरों में और विशेषकर शिवालयों में गर्भग्रह की चौखट पर हम कीर्तिमुख को पाते हैं। द्वार के ऊपर अथवा नीचे दहलीज़ पर यह आकृति बनी होती है। मंदिर के मूल विग्रह के दर्शन से पहले दर्शनार्थियों को मुख्य द्वार पर कीर्तिमुख दिखता है और उसके बाद ही भगवान् के दर्शन होते हैं। माणिकनगर में भी प्रभु मंदिर के गर्भग्रह की पत्थर की चौखट पर कीर्तिमुख का शिल्प तराशा हुआ है।

यह तो हुई पौराणिक कथा। अब यह स्वाभाविक है, कि इस विचित्र कथा को पढ़ कर हमारे मन में कुछ संदेह उठ सकते हैं। स्वयं को खा लेने का अर्थ क्या है? भगवान् उस राक्षस पर इतने प्रसन्न क्यों हुए? भला उसने ऐसा कौनसा पराक्रम कर दिया जो भगवान् ने उसको इतना बड़ा गौरव प्रदान किया? पुराणों की कथाएँ बाहर से जितनी सरल दिखती हैं, भीतर से उतना ही गहरा अर्थ उनमें छिपा होता है। प्रत्येक कथा हमें वेदांत के किसी न किसी सिद्धांत के दर्शन कराती है और यह कथा भी वैसी ही है।

इस रहस्यमयी कथा का मर्म बड़ा ही सुंदर है जिसको जानने के लिए हमें इस प्रसंग का सूक्ष्म परिशीलन करना होगा। वेदांत का सिद्धांत है, कि आत्मज्ञान को प्राप्त करने के मार्ग में सबसे बड़ा प्रतिबंध हमारा अहं है। श्रीमार्तंडप्रभु तो हमें सचेत करते हुए कह रहे हैं – “अरे हे महावाक्य घे नीट कानी। स्वरूपी अहंता कदापी न आणी॥” हमारा ‘मैं पन’ ही हमारी आध्यात्मिक उन्नति की सबसे बड़ी बाधा है। जब तक हम अपनी अहंता को निःशेष नहीं करते तबतक हम अपने स्वस्वरूप से वंचित रहकर दुःख सहते रहते हैं। हम अपने अहंभाव के कारण ही संसार के बंधनों से बंधते हैं और अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं कर पाते। श्री मार्तंडप्रभु कहते हैं – ‘‘प्रभु सन्निधी मीपणा तो नसावा।’’ हमारा जीवभाव ही हमें प्रभु से विमुख कर रहा है। अतः परमात्मप्राप्ति के लिए इस जीव भाव को, अहंकार को मिटाना नितांत आवश्यक है। प्रतिबिंब से तादात्म्य तोड़कर जब हम बिंब के साथ एकरूप होते हैं तब हम मुक्त हो जाते हैं। जो अपने अहं को, मैं पने को, मिटा देता है अथवा खा लेता है उसपर प्रभु अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। अब आप यह जान गए होंगे कि, भगवान् शंकर उस राक्षस पर क्यों प्रसन्न हुए थे? अहंभाव को मिटाने की कीर्ति से ब़ढ़कर और कोई कीर्ति इस संसार में नहीं है इसीलिए भगवान् ने अपने आप को (अपने अहंभाव को) खा लेने वाले राक्षस पर मुग्ध होकर, उसको कीर्तिमुख का नाम दिया। श्रीप्रभु अपनी एक रचना में कहते हैं – ‘माणिक म्हणे पूर्ण राम मी झाले। मीपण माझे भंगले॥ सये मन राम रूपी रंगले॥ अहंभाव को भंग कर देने के बाद ही जीव राम के रंग में रंग जाता है।

कीर्तिमुख की कथा से एक और सिद्धांत उभरकर आता है। ऐसा है कि हमारी भूख, तृष्णा, कामना, इच्छा और वासनाओं का कोई अंत नहीं है। एक के बाद एक हमारी इच्छाएँ बढ़ती जाती हैं। कुछ कामनाओं की पूर्ति के बाद फिर मन चंचल हो जाता है और हम अपनी क्षुधा मिटाने के लिए विषयों के पीछे दौड़ते रहते हैं। इस प्रकार हमारा मन सदा अतृप्त ही रहता है। तो इस अतृप्त मन को कैसे तृप्त किया जाए? ऐसी कौनसी वस्तु है, जिसको प्राप्त कर लेने से हमारी सारी अपूर्णता क्षण में समाप्त हो जाए? हम पूर्ण हो जाएं, संतृप्त हो जाएँ ऐसा क्या है? यह असंभव सा प्रतीत हो रहा होगा, परंतु ऐसा बिलकुल हो सकता है। हम चाहे जितनी वस्तुओं को इकट्ठा कर लें, वो वस्तुएँ हमारी भूख नहीं मिटा सकतीं। हम पूर्णरूप से तृप्त तभी हो सकते हैं जब हम अपने अहंकार को समाप्त कर दें। जैसे कीर्तिमुख की भूख स्वयं को खाने के बाद ही शांत हुई थी उसी प्रकार हमारी भूख भी तभी समाप्त हो सकती है जब हम अपने आप को खा जाएँ अपने अहंभाव को समाप्त करें।

कीर्तिमुख ने जैसे अपने आप को मिटाने के लिए किसी अन्य की सहायता नहीं ली, उसने स्वयं ही प्रयत्न किया उसी प्रकार हमारा उद्धार भी केवल स्वयं के ही प्रयत्नमात्र से संभव है। ‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’ कहकर भगवान् ने स्वयं इस बात की पुष्टि की है।

जब हम स्वयं को खा डालते हैं तब कामना करने वाला ही नही रहता और हमारी भूख सदा के लिए शांत हो जाती है। हमें परम समाधान मिलता है। हम परिपूर्ण हो जाते है। संतृप्त हो जाते हैं।

कीर्तिमुख, अहंकार पर विजय का प्रतीक है। मंदिरों के द्वार को भूषित करने वाला कीर्तिमुख साधकों को सदा इसी बात का स्मरण दिलाता रहता है, कि अहंकार को मिटाओ और चित्स्वरूप परमात्मा से एकरूप हो जाओ। अहंकार को मिटाना ही जगत् की सबसे बड़ी कीर्ति है, मानव जन्म की सबसे बड़ी उपलब्धि और सार्थकता है। अतः जिन्हें सदा के लिए अपनी चंचलता को, कामनाओं को, तृष्णाओं को मिटाना हो उन्हें वस्तुओं का पीछा छोड़कर अपने अहंकार को ग्रसने की साधना करनी चाहिए। अगली बार जब भी आप श्रीप्रभु की आराधना करने के लिए मंदिर में जाएँ तब पहले कीर्तिमुख को देखकर सावधान हों और अपनी अहंता को भुलाकर तल्लीनता से श्रीचरणों की उपासना से धन्यता पाएँ।

पदा पावण्या ज्ञान हे द्वार मोठे।
महाद्वार ओलांडिता वस्तु भेटे॥
महाद्वार ओलांडुनी आत जावे।
स्वये नासुनी मुख्य देवा भजावे॥