१८ सितंबर से अधिकमास का आरंभ होने जा रहा है। कहा गया है अधिकस्य अधिकं फलम्‌ – अधिक मास के दौरान अधिक से अधिक समय जप-तप, अनुष्ठान में व्यतीत करने से हमारी साधना को विशेष बल मिलता है। गत कुछ दिनों से संस्थान के कार्यालय से संपर्क करके कईं भक्तजनों ने जानना चाहा कि आने वाले इस अधिकमास में हम भक्तजनों के लिए श्रीजी की क्या आज्ञा है? कहा जाता है, कि अधिकमास में कुछ विशेष साधना करनी चाहिए कुछ धार्मिक कर्म करने चाहिए। तो ऐसी कौनसी साधना है जो हम इस अधिकमास में करें, जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए श्रेयस्कर हो? इस प्रश्न को लेकर संस्थान के कार्यालय को अनेक भक्तजनों के फोन आए। वैसे तो सभी सांप्रदायिक सद्भक्त गुरु आज्ञानुसार अपनी-अपनी साधना में नियमितरूप से लगे रहते हैं परंतु जब ऐसा कोई विशेष पर्व या अवसर आता है तो भक्तजन श्रीजी के निर्देश के लिए उनकी अनुज्ञा के लिए उत्सुक रहते हैं। भक्तजनों की यही इच्छा होती है, कि किसी भी प्रकार के व्रत-अनुष्ठान को आरंभ करने से पहले वे अपने सद्गुरु की अनुज्ञा पा लें। अपनी समझ के अनुसार या किसी के कहने पर हम सब समय-समय पर विविध प्रकार की छोटी-बड़ी उपासनाऍं करते हैं परंतु अपने सद्गुरु द्वारा बताए हुए उपासना क्रम को निष्ठापूर्वक पूर्ण करने का समाधान कुछ अलग ही होता है। कुछ दिनों पहले हमने श्रीजी के समक्ष यह बात रखी और उनसे पूछा, कि सांप्रदायिक सद्भक्तों के लिए अधिकमास में आचरणयोग्य कोई अनुष्ठान बताऍं तो श्रीजी ने कहा ‘‘अद्वैत बोधू आम्ही हाची हो आमुचा धंदा। वेदांत का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है क्योंकि वेदांत शास्त्र के नियमित अध्ययन के बिना आध्यात्मिक साधना फलीभूत नहीं हो सकती। हम इस एक माह की कालावधि में श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से वेदांत शास्त्र का अध्ययन करेंगे।’’ हम सभी भक्तजनों पर श्रीजी की यह बहुत बड़ी कृपा हुई है, ऐसा मेरा मानना है। वेदांत शास्त्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए तथा सभी जिज्ञासुओं के लिए सीखने का यह एक स्वर्णिम अवसर है।
दैनंदिन जीवन में हम सब अपने काम-काज में इतने व्यस्त हो जाते हैं, कि वेदांत के अभ्यास को गंभीरता से नहीं लेते। मेरे पास उतना समय नहीं है – ऐसा कहकर बहाना बना लेते हैं। यह अधिकमास इसीलिए आता है, कि प्रायः हम जो ठीक से नहीं कर पाते उसे भरपूर समय दें और अपनी जीवनशैली के साथ उसे शाश्वतरूप से जोड़कर आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त करें। समय का नियोजन कैसे करना चाहिए यह भगवान्‌ ने बताया है: युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। इस श्लोक का तात्पर्य यह है, कि युक्त आहार-विहार करने वाले, यथायोग्य परिश्रम करने वाले और यथायोग्य सोने-जागने वाले योगी के सभी प्रकार के दुःख समाप्त हो जाते हैं। जो यथोचित आहार लेते हैं, योग व्यायामादि के लिए यथायोग्य समय देते हैं, योग्यरीति से कर्तव्य कर्म में रत रहते हैं और समयोचित पद्धति से सोते और जागते हैं, ऐसे साधक सदा दुःख से दूर रहते हैं। हम सब अपनी दिनचर्या में आहार, विहार, व्यवसाय तथा निद्रा के लिए नियमितरूप से भरपूर समय देते हैं परंतु अवबोधन के लिए समय नहीं दे पाते। वास्तव में अवबोध का अर्थ है जानना परंतु यहॉं भगवान्‌ जानने को ही सही अर्थ में जागना कह रहे हैं। जिनके जीवन में अध्यात्म का महत्व है ऐसे साधकों को प्रतिदिन नियमितरूप से अवबोधन के लिए अर्थात्‌ आध्यात्मिक साधना के लिए समय निकालना ही चाहिए। वेदांत का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना ही सही अर्थ में जागना है क्योंकि वेदांत विचार के कारण ही हम मोहनिद्रा से जागते हैं। भगवान्‌ ने तो हमें आदेश दिया है परंतु क्या हम प्रतिदिन वेदांत चिंतन के लिए समय निकालते हैं? यह अधिकमास उसी अवबोधन का एक अवसर है। जिस काम के लिए हम प्रायः समय नहीं देते उसी काम को ठीक से करने का यह एक अच्छा अवसर मिल रहा है। सोना कैसे है यह तो हम सबको बहुत अच्छे से पता है परंतु जागते कैसे हैं इसका अभ्यास इस अधिकमास में हमें करना है। मोहनिद्रा से हम सबको जगाने के लिए हमारे सद्गुरु इस अधिकमास के दौरान संपूर्ण एक महीने की कालावधि में श्रीमद्भगवद्गीता पर नित्य प्रवचन करने वाले हैं। श्रीजी का हम भक्तजनों पर जो असीम प्रेम है, उनका जो वात्सल्य है वही उनकी वाणी के माध्यम से हम सब पर बरसने वाला है। वर्तमान परिस्थिति के कारण श्रीजी का प्रवचन यूट्यूब के माध्यम से लाइव प्रसारित किया जा रहा है जिससे घर बैठे-बैठे ही हम प्रवचन का लाभ उठा सकें। सभी उत्सुक श्रोतोओं को एक और महत्वपूर्ण जानकारी यह भी देनी है, कि प्रवचन के विषय से संबंधित आप के प्रश्न आप ९४४८४६९९१३ इस वाट्सॅप नंबर पर लिखकर भेज सकते हैं। श्रीजी अपने व्याख्यान के समय उन प्रश्नों के उत्तर देकर आपकी शंकाओं का समाधान करेंगे।
हमने सुन रखा है, कि सत्संग में उपस्थित रहने से पुण्य मिलता है। इसलिए बहुत से लोग पुण्य कमाने मात्र के लिए सत्संग में जाकर बैठते हैं। सत्संग में उपस्थित रहने मात्र से पुण्य की प्राप्ति तो अवश्य होती है परंतु वास्तव में जो होना चाहिए वह नहीं हो पाता। इसलिए नहीं होता क्योंकि हम अक्सर सत्संग में जो सुनते हैं उन बातों को उसी पंडाल में छोड़ कर चले आते हैं। अज्ञान का अंधकार मिटाकर साधकों को उनके ज्ञानस्वरूप का साक्षात्कार करवाना ही सत्संग का मुख्य प्रयोजन है। कथाओं में और प्रवचनों में जो कुछ हम श्रवण करते हैं उसपर मनन और चिंतन यदि नहीं हुआ तो वह श्रवण व्यर्थ है। जैसे, भोजन के बाद पचन की प्रक्रिया ठीक से यदि नहीं हुई तो शरीर को भोजन का कोई लाभ नहीं होता उसी प्रकार श्रवण के बाद मनन-चिंतन यदि ना हो तो उस श्रवण का भी लाभ नहीं होता। प्रवचन को केवल सुनने मात्र से हमारे भीतर कोई परिवर्तन होने वाला नहीं है। यह अत्यंत अनिवार्य है, कि श्रीजी के वचनामृत का श्रवण करने के बाद हम मनन एवं चिंतन के लिए भी समय निकालें। श्रवण के पश्चात्‌ पर्याप्त समय मनन-चिंतन में बिताने का नाम ही अवबोधन है और भगवान्‌ ने इसी प्रक्रिया को जागना कहा है। नित्य सायं एक घंटे के लिए हम श्रीजी के मुखकमल से गीता का श्रवण करने वाले हैं तो दिनभर में कम से कम एक घंटे का समय तो हमें उस विषय के विचार को देना ही चाहिए। हम ऐसा नहीं कह सकते कि सुनने मात्र का समय हमारे पास है लेकिन मनन, चिंतन वगैरा हम नहीं कर पाएंगे। श्रवण, मनन और निदिध्यासन यह एक संपूर्ण प्रक्रिया है और जो विधिवत्‌ इस प्रणाली का अनुकरण करते हैं वही अध्यात्म साधना में सफल होते हैं। यह बात भी सत्य है, कि अनेक प्रभुभक्त इस अधिकमास के दौरान विविध प्रकार के अनुष्ठान आदि करने वाले हैं। माणिकनगर में विष्णुयाग का आयोजन हो रहा है, कईं लोग अपने-अपने घरों में पारायण, भजन, जप आदि करने वाले हैं परंतु इन सभी व्यस्तताओं के बावजूद हमें अवबोधन के लिए समय निकालना ही चाहिए। विविध प्रकार के साधनों में फंसे रहने से बेहतर है कि हम नियमितरूप से वेदांत विचार के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करें क्योंकि यह ज्ञानयज्ञ हमारे लिए परमश्रेयस्कर है। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।। अन्य सभी प्रकार के यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञान ही संपूर्ण कर्मों की पराकाष्ठा है। ऐसा स्वयं भगवान्‌ गीता में कहते हैं। सकलमत संप्रदाय के अनुयायी होने के नाते हमारा यह परम कर्तव्य बनता है, कि हम एक महीने तक नित्य चलने वाले इस ज्ञानयज्ञ का संपूर्ण लाभ उठाऍं। जो अपने जीवन को परिवर्तित करना चाहते हैं, जो अध्यात्म में प्रगति करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का अभ्यास अत्यंत अनिवार्य है। गीता का यह अभ्यास मोहनिद्रा से जागने की प्रक्रिया है और मोहनिद्रा इतनी गहरी है कि जागने के लिए प्रयत्न आवश्यक है।
शुक्रवार १८ सितंबर २०२० से नित्य शाम ६ बजे श्रीजी श्रीमद्भगवद्गीता पर प्रवचन करेंगे और यह क्रम एक संपूर्ण एक माह तक अर्थात्‌ १६ अक्तूबर २०२० तक चलने वाला है। यह व्याखानमाला केवल इसीलिए आयोजित की जा रही है, कि हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश फैले और हमारा उद्धार हो। एक गुरु होने के नाते श्रीजी तो अपना कार्य अत्यंत दक्षता से कर रहे हैं परंतु शिष्य होने के नाते हमें अपने कर्तव्य को ठीक से समझकर इस अवसर का सही लाभ उठाना चाहिए। अपनी अनेक व्यस्तताओं को महत्व न देकर हम भक्तजनों के उद्धारहित श्रीजी अपना समय निकालकर इस ज्ञानयज्ञ के माध्यम से हम पर जो उपकार कर रहे हैं उसके लिए मैं सभी की ओर से श्रीजी के चरणों में कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता हूँ।